तुम मुझे समझते हो


Kamukta, antarvasna मेरे पिताजी पुलिस में हैं और वह बड़े ही सख्त मिजाज के हैं उनसे हमारे मोहल्ले में सब लोग डरते हैं और मैं भी अपने कॉलेज के बाद अपने घर पर ही थी लेकिन मेरा कई बार मन होता कि मैं किसी स्कूल में पढ़ाऊँ लेकिन अपने पिताजी के सामने मेरी हिम्मत ही नहीं हो पाती और मैं घर के अंदर ही रहती। मैं घर से बाहर बहुत कम ही निकलती थी मेरी मम्मी भी मेरे पापा से डरती हैं और मेरे भैया भी मेरे पापा से कुछ भी नहीं कहते शायद उनकी मेरे प्रति गलत धारणा है इसीलिए वह मुझे कहीं बाहर जाने नहीं देते। मैं घर के अंदर ही अंदर घुटती रहती हूं और मुझे काफी दिक्कतें होती हैं मैं सिर्फ शाम के वक्त अपने छत पर टहलने के लिए चली जाती हूं और जब कुछ जरूरी काम होता है तो अपने मम्मी के साथ मैं मार्केट जाया करती बस इतने ही मेरी जिंदगी थी और इससे ज्यादा मेरे जीवन में कुछ भी नहीं था।

एक दिन हमारे पड़ोस में कुछ लड़के पतंग उड़ा रहे थे मैं उन्हें देखी जा रही थी और मैं खुश हो रही थी तभी पतंग हमारी छत पर आकर गिरी मैंने वह पतंग उठाई तो सामने से एक लड़का आया जब मैंने उसे देखा तो शायद मैं उसे अपना दिल दे बैठी थी क्योंकि वह देखने में इतना ज्यादा हैंडसम था कि मैंने उसे अपना दिल दे दिया। मुझे उसका नाम भी नहीं पता था मैं जब भी छत में जाती तो मुझे हर शाम वह छत में दिखाई देता एक दिन वह मेरे पास आया उनकी छत और हमारी छत बिल्कुल ही सटी हुई थी मुझे नहीं मालूम था कि उसका नाम क्या है। वह मेरे पास आया और उसने मुझसे बात की तो मुझे अच्छा लगा उसने मुझसे मेरा नाम पूछा मैंने उस अपना नाम बताया वह कहने लगा क्या तुम हमेशा शाम को छत पर आती हो? मैंने उसे कहा हां। मुझे उसका नाम पता चल चुका था उसका नाम सार्थक है और वह दिल का बहुत अच्छा है सार्थक और मैं हमेशा छत पर ही मिला करते थे जैसे ही शाम के 5:00 बजते तो मैं छत पर चली जाया करती सार्थक भी छत पर चला आता था।

सार्थक और उसका परिवार कुछ समय पहले ही हमारे पड़ोस में रहने के लिए आए थे, सार्थक ने मुझसे कहा क्या तुम कभी घर से बाहर नहीं निकलती तो मैंने उसे बताया नहीं मैं घर से बाहर कम ही जाती हूं लेकिन मैंने उसे यह बात नहीं बताई थी कि मैं अपने पिताजी की डर की वजह से घर से बाहर नहीं जाती। एक दिन सार्थक मुझे कहने लगा आजकल एक बड़ी ही अच्छी सी मूवी लगी है क्या तुम मेरे साथ मूवी देखने चलोगी मैंने सार्थक से कहा नहीं मैं नहीं आ पाऊंगी मैंने सार्थक से कहा लेकिन मैं घर से बाहर ही नहीं निकलती हूं तो हम लोग मूवी देखने कैसे चलेंगे। सार्थक कहने लगा तुम बस हां कह दो फिर हम लोग मूवी देखने के लिए चलेंगे मैंने उसे कहा ठीक है सार्थक मुझे कहने लगा तुम ठीक 5:00 बजे छत पर आ जाना और तैयार होकर आना मैंने सार्थक से कहा ठीक है। उस दिन ना जाने इतना लंबा समय क्यों लग रहा था शाम के 5:00 ही नहीं बज रहे थे जैसे ही 4:30 बजे तो मैंने मम्मी से कहा मम्मी मैं छत पर जा रही हूं मम्मी कहने लगी ठीक है बेटा। मैं छत पर चली गई और ठीक 5:00 बजे सार्थक छत पर आ गया सार्थक ने मुझे कहा तुम छत से इधर आ जाओ सार्थक ने मेरा हाथ पकड़ा और मैं सार्थक के छत पर चली गई वहां से हम लोग सीढ़ी से नीचे उतरे। सार्थक के घर पर कोई नहीं था सार्थक ने जल्दी से बाइक स्टार्ट की और मैं उसके पीछे बैठ गई मैंने अपने मुंह पर अपना दुपट्टा लपेट लिया था और हम लोग वहां से मूवी देखने के लिए चले गए। हम लोग 15 मिनट बाद पहुंच गए और वहां मूवी शुरू हो गई मुझे बहुत अच्छा लग रहा था क्योंकि इतने समय बाद मैं खुलकर अपनी जिंदगी जी पा रही थी और इतने समय बाद मैंने मूवी देखी थी। सार्थक के साथ मैं बहुत खुश थी मैंने सार्थक का हाथ पकड़ा और उसे कहा मैं तुम्हारा धन्यवाद कैसे कहूं मुझे कितना अच्छा लग रहा है। सार्थक मुझे कहने लगा तुम्हें मुझे धन्यवाद कहने की जरूरत नहीं है तुम्हारे साथ मैं भी मूवी देखने के लिए आ गया नहीं तो मैं भी बहुत कम ही आया करता हूं। हम दोनों ही मूवी देख रहे थे और जैसे ही मूवी खत्म हुई तो हम लोग वहां से जल्दी से बाहर निकले और सार्थक ने बड़ी तेजी से बाइक चलाई हम लोग जल्दी ही घर पहुंच गए और सार्थक ने मुझे मेरे छत पर उतार दिया मैं वहां से अपने घर चली आई। मेरी मम्मी कहने लगी बेटा तुम इतनी देर से छत में क्या कर रही थी मेरी मम्मी बहुत कम छत पर आया करती हैं मैंने मम्मी से कहा मम्मी बस छत में बैठी हुई थी मैंने मम्मी से पूछा पापा नहीं आए वह कहने लगी नहीं अभी तो तुम्हारे पापा नहीं आए हैं।

मैं उस दिन बहुत खुश थी और उस दिन जब मैंने सार्थक से बात की तो मुझे बहुत अच्छा लगा मैंने सार्थक से कहा मैं काफी समय से अपनी जिंदगी जीना चाहती थी लेकिन मुझे ऐसा मौका ही नहीं मिल पाया लेकिन तुमने आज मेरे सपनों को पूरा कर दिया और मुझे ऐसा लगा जैसे कि मैं अपनी जिंदगी जी रही हूं। अब यह सिलसिला चलता रहा सार्थक मेरी हर खुशियों को पूरा करता उसने मुझे एक दो बार गिफ्ट भी दिए थे मुझे समझ नहीं आ रहा था कि सार्थक और मेरे बीच में क्या रिश्ता है लेकिन मुझे सार्थक के साथ समय बिताना अच्छा लगता। जब भी हम दोनों साथ में होते तो मुझे बहुत ही खुशी होती लेकिन मैं जब इस बारे में सोचती कि कभी इस बात का पता मेरे पापा को चल गया तो वह मुझे बहुत डांटेंगे और वह कहीं सार्थक को भी कोई नुकसान ना पहुंचा दे। मैंने सार्थक से एक दिन इस बारे में बात की सार्थक मुझे कहने लगा तुम घबरा क्यों रही हो जब मुझे डर नहीं लग रहा तो तुम्हें डरने की क्या जरूरत है। सार्थक के यह कहने पर मुझे लगा कि सार्थक बिल्कुल सही कह रहा है हम दोनों चोरी-छिपे मिलने लगे थे और हम दोनों के बीच शायद प्यार पनपने लगा था।

हम दोनों एक दूसरे को प्यार करने लगे थे और मुझे बहुत अच्छा लगता है जब भी मैं सार्थक के साथ समय बिताया करती सार्थक ने मेरे अंदर जैसे एक हिम्मत पैदा कर दी थी मैं चाहती थी कि मैं अब किसी स्कूल में पढ़ाने के लिए जाऊं। मैंने अपनी मम्मी से इस बारे में बात की तो मेरी मम्मी कहने लगी बेटा तुम पढ़ा कर क्या करोगी और तुम्हें तो पता है कि तुम्हारे पापा कभी भी तुम्हें पढ़ाने के लिए नहीं भेजेंगे। मैंने अपनी मम्मी से कहा लेकिन आप एक बार तो पापा से बात कीजिए मेरी मम्मी ने कहा ठीक है मैं कोशिश करूंगी। जब पापा ऑफिस से लौटे तो उनका मूड काफी अच्छा था और वह बहुत खुश नजर आ रहे थे मेरी मम्मी ने उनसे जब इस बारे में बात की तो वह कुछ देर तक तो मेरी मम्मी के चेहरे को देखते रहे। मुझे बहुत डर लग रहा था क्योंकि मैं अंदर दरवाजे से यह सब देख रही थी उन्होंने मुझे आवाज देते हुए बुलाया और कहा पायल तुम यहां आना। जब मैं उनके पास गई तो मैंने अपनी नजरें झुका ली मुझे बहुत डर लग रहा था पापा ने मुझसे पूछा क्या तुम बढ़ाना चाहती हो तो मैंने उनसे कहा जी पापा मैं घर में अकेली रहती हूं तो मुझे लगता है कि मुझे भी पढ़ाना चाहिए। उन्होंने उस दिन मुझे हां कह दिया मैं बहुत खुश हो गई और मैं इंटरव्यू देने के लिए जाने लगी मेरा सिलेक्शन एक प्राइवेट स्कूल में हो गया अब मैं और सार्थक एक-दूसरे से मिला करते थे हम दोनों की नजदीकियां बहुत बढ़ चुकी थी। मैं जब भी सार्थक से मिलती तो मुझे बहुत अच्छा लगता और ऐसा लगता वह मुझे बहुत अच्छे से समझता है और बहुत ज्यादा मेरा ध्यान रखता है।

एक दिन मैं अपने स्कूल से घर गई तो उस दिन मुझे सार्थक छत पर मिला और कहने लगा आज घर पर कोई नहीं है क्या तुम मेरे लिए खाना बनाओगी। मैंने उसे कहा ठीक है मैं अभी आती हूं मैं सार्थक के छत पर चली गई और वहां से उसके घर चली गई। जब हम दोनों साथ में बैठ कर बात कर रहे थे तो सार्थक ने कहा तुम कुछ बना दो मैंने उसके लिए खाना बना दिया। जब उसने खाना खाया तो वह कहने लगा तुम्हारे हाथों में तो जादू है आज मुझे मजा आ गया। हम दोनों एक दूसरे से बात कर रहे थे लेकिन ना जाने मेरे अंदर उसको देखकर उस दिन ऐसी क्या फीलिंग आई और सार्थक के अंदर भी मुझे लेकर कुछ चल रहा था। सार्थक मेरे पास आया तो उसने मेरे होठों को किस किया और मैंने भी उसके होठों को चूमते हुए उसे काफी देर तक किस किया। हम दोनों को ही मजा आने लगा था जैसे ही सार्थक ने अपने 9 इंच मोटे लंड को बाहर निकाला तो मैंने उसक सकिंग करना शुरू किया और मै उसे सकिंग करती तो मुझे बहुत मजा आता।

मुझे उसके लंड को अपने मुंह में लेने में काफी मजा आ रहा था और मैंने काफी देर तक उसके लंड को सकिंग किया। जैसे ही सार्थक ने मुझे बिस्तर पर लेटा कर मेरे दोनों पैरों को चौड़ा करते हुए मेरी चूत के अंदर अपने लंड को डाला तो मेरी सील टूट चुकी थी और मेरी चूत से खून आने लगा। उसमें मुझे एक मीठा सा दर्द हो रहा था और वह मुझे बड़ी तेजी से धक्के देते जाता उसके धक्के इतने तेज होते कि मेरा पूरा शरीर हिल जाता। जब उसका लंड मेरी योनि के अंदर बाहर होता तो मेरे अंदर एक अलग ही जोश पैदा हो रहा था मैंने उसका साथ काफी देर तक दिया। जब मैं झड़ गई तो मैंने अपने दोनों पैरों से उसे पकड़ लिया मेरी योनि से खून निकल रहा था लेकिन वह मुझे बड़ी तेज गति से चोदता रहता। वह मुझे इतनी तेजी से चोद रहा था कि मुझे बहुत मजा आता जैसे ही उसने अपने वीर्य को मेरे स्तनों पर गिराया तो मुझे बहुत अच्छा लगा उसके बाद तो यह सिलसिला जारी रहा हम दोनों चोरी छुपे मिलते हैं और एक दूसरे से सेक्स का मजा लेते हैं।


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